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Blind Street

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प्रदीप सौरभ का नया उपन्यायस ‘ब्लाइंड स्ट्रीट’ हिंदी का शायद पहला उपन्यास है, जो बहुत सारे ‘डिफरेंटली एबिल्ड’ की अंधी दुनिया के उन अंधेरों–उजालों को परत–दर–परत उघाड़ता चला जाता है, जिनकी हिंदी के कथा साहित्य में प्राय% उपेक्षा ही की जाती रही है । यह एक नायक–नायिका वाला उपन्यास नहीं, बल्कि बहुत से नायक नायिकाओं वाला उपन्यास है । हर नायक–नायिका की कहानी अलग होते हुए भी एक दूसरे से मिक्स होती हुई चलती हैं । यह उपन्यास बहुत सारी कहानियों का धारा प्रवाह ‘मेडले’ और ‘फ़्यूजन’ है । इसी मानी में प्रदीप सौरभ का यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों की तरह हिंदी के चालू उपन्यास जगत के बीच अनूठी चमक रखता है । वे रिसर्च करके कहानी कहते हैं सिर्फ ‘गल्प’ नहीं कहते! इस उपन्यास को पढ़ते हुए लगता है कि लेखक ने ऐसे सैकड़ों लोगों से मिल–बात करके, उनके अकेलेपन, उनकी निराशाओं, उनके दुख दर्दों, उनके संघर्षों को गहरे महसूस करके इसे लिखा है । कथा कहने की यह युक्ति नई है, जहां कथाकार शहर में घूमते हुए आइने की तरह एक उपेक्षित किंतु स्पेशल दुनिया की झलकियां दिखाता जाता है । यह रिपोर्ताजों का ‘रिमिक्स’ है इसलिए अधिक विश्वसनीय है । नए समाजशास्त्रियों के लिए यहां एक प्रकार का ‘डाटा’ भी उपलब्ध है । यहां चित्रित किए गए चरित्र हमारी दया के नहीं, सम्मान के हकदार हैं । आम दुनिया वाले इनको भले ही ‘दीन हीन’ समझें, लेकिन ये किसी से दया नहीं बल्कि बराबरी चाहते हैं ।

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