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Chauraahe Se Aage

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उपन्यास 'चौराहे से आगे' एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो अपने युवाकाल में समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर कुछ करना चाहता है। क्रान्तिकारी से लेकर समाज-सुधारक बनना चाहता है। भगत सिंह से लेकर विवेकानन्द उसके आदर्श है। परन्तु कालान्तर में मध्यमवर्गीय समाज के दबाव में नौकरी करता है, घर-परिवार बनाता है। बैंक की नोकरी में ट्रेड यूनियन से भी जुड़ता है और अन्तत: घरेलू जिम्मेदारियों को पूरा करता सेवानिवृत्त हो जाता है। उपन्यास मूलत: कुमार विकल के सेवानिवृत्त होने के बाद, पत्नी के देहान्त, उनके एकांगीपन एवं बहू-बेटे के द्वारा तिरस्कार को कथावस्तु बनाता है। और बाद में अपने युवाकाल के सपनों के साथ जुड़ना उपन्यास की सार्थकता है। कुमार विकल अपने समकक्ष एवं समान विचारों वाली एकांगी महिला, जो अपने इकलौते विदेश में बसे बहू-बेटे से दूर रहती हैं, के साथ नये प्रेम की पराकाष्ठा, समाज सेवा एवं समकालीन राष्ट्रीय चुनौतियों से रू-ब-रू होकर नये स्वप्न देखने पर केन्द्रित है। कथा में दोनों अपने शहर में साम्प्रदायिक दंगों को शान्त करने हेतु अपने प्राणों की बाजी लगाकर योगदान करते है। उनका संघर्ष माâिया एवं साम्प्रदायिक सरगनाओं से है। उनके योगदान के चलते आस-पास के लोग अपना डर छोड़कर बड़ी तादात में सामने आते है। उपन्यास की नायिका शालिनी घरेलू महिलाओं के बीच सामाजिक सरोकार की मशाल जलाती है। उपन्यास मूलत: वानप्रस्थ की आज के समकालीन दौर की नवीन व्याख्या है। उपन्यास का कथानक यह रेखांकित करता है कि साठ के बाद की जिन्दगी का उपयोग एक युवा मन की तरह किया जा सकता है-प्रेम करके, समाज सुधारक बनकर, क्रान्तिकारी बनकर।

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