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Dehari Ka Deeya

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खतरनाक समय में जीवन की तलाश करना उल्टी गंगा बहाने जैसा है । जहाँ जीवन में संकट अधिक और उम्मीदें कम रह जाती हैं, सिर्फ आस–पास अँधेरा ही अँधेरा होता है––– उस अँधेरे में आत्मा की छटपटाहट उसके तेज को पल प्रतिपल निष्प्रभ बनाने की लगातार कोशिश करती है । ‘देहरी का दीया’ ऐसे ही खतरनाक समय की उम्मीद है । उसके लिए अन्दर और बाहर जैसी बाइनरी नहीं है, बल्कि इसके इतर वह अपने जीवन के अंतिम क्षण तक ‘स्व’ और ‘पर’ की भावना से परे सबको प्रकाशित करता है । हालांकि ‘देहरी का दीया’ जितनी तीव्रता से अन्दर–बाहर, अपने–पराये के संबंधों के बीच कलुषित मन को आह्लाद में परिवर्तित करता है, उसे प्रज्ज्वलित करता हैय उतने ही क्षण में वह नितांत अकेला और निष्प्रभ होता जाता है । यही जीवन है और उसका अमिट सत्य––– । इसे झुठलाया नहीं जा सकता । डॉ– पी– एन– सिंह इस भाव को लेकर विचारमग्न हैं । वे संबंधों टूटते–बिखरते और असंवेदनशील होते बुद्धिजीवियों यथास्थिति को परत–दर–परत, पन्ना–दर–पन्ना उलटते–पलटते हुए जीवन के गुणा–भाग को समझने की कोशिश करते हैं । एक एक करके सबका बही–खाता निकालते हुए कई बार वे भावुक हो जाते हैं । शायद यही समय है जब हम अपने नितांत अकेलेपन में सबसे ज्यादा जोड़–घटाव करते हुए संवेदनशील होते हैं । इसी समय संबंधों को समेट लेने की बेचैनी और केंद्रीभूत होते संबंधों की हरहराहट अधिक होती है । डॉ– पी–एन– सिंह जिस विचारवान और क्रांतिकारी व्यक्तित्व की तलाश करते हुए संवेदनशील होते हैं, वह हमारे लिए जरूरी है । ‘देहरी का दीया’ हमारे दोहरे वैचारिक विचलन और असंवेदनशील समय की सबसे जरूरी खोज है

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