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Dooriyan

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समय किसीके लिए नहीं रुकता लेकिन उसके बीत जाने पर भी लोग उसमें अटके रहते हैं । ‘दूरियाँ’ ऐसे ही अटकावों की कहानी है । इस उपन्यास का नायक राममनोहर दास दया और सहानुभूति का अधिकारी है, या घृणा और तिरस्कार काµ यह तो पाठक तय करेंगेय इस उपन्यास की पठनीयता–अपठनीयता के निर्णायक भी वे ही होंगे । प्रकाशकीय सिफ’ारिश केवल यह है कि हडबड़ी या लापरवाही के बजाय इतमीनान से पढ़े जाने पर ‘दूरियाँ’ के केन्द्रीय सरोकार शायद उजागर हो सकेंगे ।

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