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Hindi-Gadya Ka Nirman

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हम ऐसी मनगढ़न्त बातों का उल्लेख भी न करते जो हमारे सामने हमारे देश के अनेक प्रतिष्ठित सज्जन इसी को ब्रह्म वाक्य न समझते । प्रेमसागर की रचना ‘खड़ी बोली’ में हुई है पर साथ ही उसका लक्ष्य रहा है ब्रजभाषा के लालित्य की ओर भी । भला उसकी वृत्तमयी वृत्तगंध शैली को कोई बोलचाल की ठेठ बानी का सीधा रूप कैसे कह सकता है ? भाव यह है कि अँगरेजों की ओर से हिन्दी गद्य में जो कुछ हुआ वह समय की पुकार अथवा शासन की गोहार के कारण । अस्तु, हिन्दी गद्य के निर्माण में उनका हाथ अवश्य हैय पर उसका जो कुछ रूप आज दिखाई दे रहा है वह उनकी लेखनी का चमत्कार नहीं हिन्दी हाथ का फल है । हिन्दी हाथ ने इस क्षेत्र में जो कुछ अपनी शक्ति और साहस से किया है वही आज हिन्दी का प्रदीप है । उसे हम किसी चोरबत्ती का प्रकाश नहीं कह सकते । अँगरेजी राज के हम ऋणी हैं । उसने अपनी छाया में हमें अपने आपको देखने का अवसर और अपने पथ पर चलने का साहस दिया, पर इसी नाते हम उसके दास नहीं कि उसने हमको बोलने का ढंग और लिखने का पाठ दिया ।

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