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Hindi Natak : Stri Sandarbh

Pragya

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सुंदरवन के मिथक का पुनर्पाठ यह है कि सुंदरवन कथा में वह यूटोपिया है जहां व्यवस्था की परंपरागत सोच से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है । यह वह जगह है जो व्यक्ति के रूप में उसे चयन का अधिकार देती है । स्त्रीत्व को चुनने का अधिकार यहां सुद्युम्न को सहज प्राप्य है । यहां आकर वह स्त्री की तरह जी सकता है, व्यवहार कर सकता है, प्रेम और विवाह कर सकता है । संतान उत्पत्ति कर सकता है । मां बनने का सुख उठा सकता है । यह सुंदरवन का मिथक सुद्युम्न से मुक्ति और इलाके जीने में अपनी सार्थकता पाता है । साथ ही कृत्रिम आरोप से मुक्त होकर अभिव्यक्ति की निर्भीकता भी इला पाई जाती है । उद्दाम प्रेम में नाचती इला कहती है ‘‘तुमने, पिता ने, राज्य ने – सबने मिलकर छीन लिया था मुझे–मुझसे! अब मैंने पा लिया है अपना रूप...। ‘मैं’ इस समय जो हूं, वही हूं – संपूर्ण, अखंड, समग्र! यही मेरा आत्म–रूप है, मेरी प्रकृति, मेरा सत्य मेरा ऋतु! (घोषणा करती–सी गूंजते शब्दों में) सुनो सब ! मैं बाहर हूँ तुम्हारे... तुम सबके कारागार से!’’ यही है सुंदरवन की सुंदरता और मंच पर तेज़ संगीत क्षिप्र ताल में बजता है । संतरंगा प्रकाश सुद्युम्न के इला में रूपांतरण को सामने लाता है और उसका नारीत्व बुध से मिलकर पूर्णता को पाता है । तृतीय लिंग अपनी मुक्ति का उद्घोष करता है । नाटक की प्रस्तुति में निर्देशक के सचेत प्रयास ने श्रद्धा की भूमिका निभाने वाली तृप्ता जौहरी को ही इला की भूमिका में मंच पर उतारा । यह पात्रों के अभाव के कारण नहीं बल्कि श्रद्धा के मन की कसक यहां इला के रूप में खत्म हुई और वह श्रद्धा का प्रतिरूप बनकर मंच पर उतरी । एक तरह से देखा जाए तो एक ही स्त्री पात्र को दोहराने का कारण यही है कि स्त्रियों की पराधीनता भी एक–सी है और स्वाधीनता की इच्छाएं भी समान हैं । यह दृश्य बहुत कौशल के साथ मंच पर रचा गया । —इसी किताब से

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