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Kahani Prem Ki
‘कहानी प्रेम की’ में स्त्री–विमर्श और किन्नर–विमर्श एक–दूसरे में रिले–मिले हैं । पुरुषवादी सोच न स्त्री को उसका पूरा आकाश देती है, न किन्नर को उसकी जमीन । जिस समाज को अपने सिवा कुछ दिखता है न सूझता, वह किसी का दर्द कहाँ समझेगा ? समाज तो हरपल कुछ चैखटों में दूसरों को फ़िट करने का प्रयास करता रहता है । सवाल यह है कि दूसरे चाहे जो करें, किंतु अपने को अपनी निगाह में कहाँ तक गिराएँगे पीड़ित ? संघर्ष स्वाभाविक है, जरूरी भी । बार–बार प्रयास करते रहने से सफलता अवश्य हाथ आएगी, यही सोच इंसान को आगे बढ़ाती है और संघर्ष का माद्दा देती है ।
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