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Natua Karam Bada Dhukhdai

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बिहार के मिथिलांचल में लोक–नृत्यों की एक समृद्ध परम्परा रही है । उन्हीं नृत्यों में नेटुआ–नृत्य की अपनी एक खास पहचान हुआ करती थी । नेटुआ, अर्थात् पुरुष–नर्तक! इनकी उपयोगिता, गाँवों में शादी–ब्याह, छट्ठी–छिल्ला से लेकर मुखिया–सरपंच के चुनाव–प्रचार तक में अहम मानी जाती थी । कई बार तो नेटुआ–नृत्य पेशेवर नर्तकियों को भी चुनौती दे पाने में समर्थ सिद्ध हो जाता था । लेकिन गाँव के बाबू लोगों के लिए उसी नेटुआ का महत्त्व किसी ज़रख़रीद गुलाम जैसा ही हुआ करता था । वे उसके स्त्रैण हाव–भाव, नृत्य और अदाओं से अपना मनोरंजन तो करते ही, उसके साथ अश्लील हरकतें भी करते रहते और जब मन में आता, उसे दुत्कारने तथा गाली–गलौज करने से भी बाज नहीं आते । एकाध मनचले तो उसके साथ देह–सम्पर्क के लिए भी आतुर रहते । यहाँ तक कि नेटुआ की पत्नी के साथ अभद्र व्यवहार करना भी, जैसे उनके अधिकार क्षेत्र में हो, इस मनोविज्ञान से भी वे ग्रस्त रहते । उक्त तमाम हालातों का मूल कारण, नेटुआ का आर्थिक, सामाजिक और जातीय स्तर पर पिछड़ा होना था । सर्वाधिक कष्टप्रद स्थिति तो नेटुआ के साथ तब उपस्थित होती, जब उम्र उसका साथ छोड़ने लगती । आज नेटुआ–नृत्य कला पूरे मिथिलांचल में अपने अवसान के कगार पर है । इस उपन्यास में मैंने इस कला की समृद्ध परम्परा और नेटुआ के संघर्षां के एक–एक क्षण को संजोने की चेष्टा की है । ---रतन वर्मा

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