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Pasri Hui hatheliyo Ka Sheher
पसरी हुई हथेलियों का शहर’ जयसिंह ‘नीरद’ का छठा कविता–संग्रह है । पाँच दशकों से अ/िाक अपनी दीर्घ काव्य–यात्रा में वे अलग–अलग मूड्सµअलग–अलग मन– स्थितियों से मानवीय सरोकारों और उनके लगातार बदलते जटिल संदर्भों को पूरी शिद्दत के साथ उकेरते रहे हैं । वे परिवेश को कुरूप बनाती विडंबनाओं को आँख गड़ा कर देखते और उनका कविता के सृजन में रूपांतरण करते हैं । उनकी कविता रिश्तों के आर पार देखती है, इसीलिए वह अपने पाठक को कहीं भीतर तक छीलती है । इस संग्रह की कविताएँ मंद आत्मघात की कोख से जन्मी हैं । यहाँ गरल का संघटन भी सृजन में रूपांतरित हो जाता है । जिस गति और विद्रूपता के साथ समय और परिवेश बदल रहे हैंµ जिस अवसरवाद की /ाुरी पर घूमते हुए मानवीय सरोकार चिंदी–चिंदी होकर बिखर रहे हैं, यह कविता– संग्रह उनके बीच एक सार्थक हस्तक्षेप है और मानवीय नियति की भयावहता का एक कोलाज भी ।
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