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Patton Par Theri Oss Ki Bhunden
समय का पहिया अपनी गति से घूमता जा रहा था । एक दिन निलय मुझे पुन% बस स्टैण्ड पर खड़ा दिख गया । मैं कार्यालय जाने के लिए बस की प्रतिक्षा में खड़ी थी । मुझे देखते ही वह मेरी ओर बढ़ा ही था कि मैंने उसे अनदेखा करते हुए अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया । दरअसल मैं उसके प्रेम का तिरस्कार कर शर्मिन्दा थी और उससे दृष्टि चुरा रही थी । मेरा नाम तो उसने उसी समय ज्ञात कर लिया था, किन्तु उसका नाम मुझे जीवन के इस दूसरे दौर के मुलाकात में ज्ञात हो पाया । निलय! उसके नाम में भी मुझे उसी जैसा आर्कषण व शालीनता की अनुभूति होती । वह मेरे पास आकर खड़ा हो गया । मुझसे मुखातिब होकर बातें करने लगा । इन विगत वर्षों के दरम्यान ऐसी बहुत–सी बातें थीं जो वह मुझसे पूछना चाहता था । मैं बताना चाहती थी । उसने अनेक बातें पूछीं व मैंने बतार्इं भी । मुझे वह अपना–सा लगने लगा था । वह स्नेहिल नेत्रों से मुझे देखता रहा, उसी प्रकार जैसे कॉलेज के दिनों में भावपूर्ण नेत्रों से मुझे चुपचाप देखता रहता । उसकी आँखें वही थीं, किन्तु मैं बदल गयी थी । मैं उससे दूर जाना चाहती थी, किन्तु वह। -इस पुस्तक से
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