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Sahitya Ka Janpakshdhar
साहित्य की पक्षधरता के सवाल को हर दौर में अलग–अलग तरह से विवेचित किया गया है । इस संकलन में साहित्य का तात्पर्य क्या है ?, साहित्य, पक्षधरता, साहित्य की आकांक्षा, रचनाकार की स्वतंत्रता आदि विभिन्न पहलुओं से जुड़े निबन्धों को शामिल किया गया है । साहित्य से जुड़े इन पहलुओं को शामिल करने का उद्देश्य है कि जब तक साहित्य के इन विभिन्न पहलुओं को नहीं समझा जाता तब तक साहित्य की पक्षधरता के प्रश्न को सीधे–सीधे नहीं जांचा–परखा जा सकता । साहित्य की पक्षधरता के प्रश्न का जो तर्क कबीर और तुलसीदास मध्यकाल में प्रस्तुत करते हैं वह आज के तर्क से अलग है । कबीर और तुलसी के भी तर्क एक ही युग में होते हुए भी अलग–अलग हैं । कबीर जहाँ अपने दोहों और पदों में आम–जन से जुड़ी बातों को सीधे सरल ढंग से कहते हुए उस समय की सत्ता ‘राजा’ को चुनौती देते हैं तो तुलसीदास राज प्रासाद के प्रलोभनों को ठुकराकर आम–जन के प्रति अपनी पक्षधरता प्रकट करते हैं । ---भूमिका से
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