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Sanchayan: Nityanand Tiwari
हिंदी में मौलिक चिंतन की राह पर अग्रसर होने वाले विचारकों में डॉ– नित्यानंद तिवारी प्रमुख हैं । वे जितने महत्वपूर्ण आलोचक हैं, उतने ही लोकप्रिय अध्यापक थे । आलोचक या विचारक के रूप में उनकी मौलिकता किसी आग्रह का परिणाम नहीं बल्कि साहित्य और जीवन के अन्तस्सूत्रों को अग्रहराहित होकर, वस्तुगत रूप में पहचानने और जोड़ने की कोशिश का परिणाम है । उनकी मौलिकता का सम्बन्ध सबसे पहले उनके सरोकारों से है । ये सरोकार दोतरफा हैं । एक तरफ जीवन और समाज में आनेवाले बदलावों के साथ साहित्य और साहित्यिक रूचि–संस्कार के विकास का प्रश्न, दूसरी तरफ नए साहित्य के अनुरूप अध्ययन–अध्यापन में आनेवाले बदलाव का प्रश्न । यह दूसरा प्रश्न अधिकांश आलोचकों–विचारकों के लिए चिंता का विषय नहीं बनता, जैसे पहला प्रश्न अधिकांश अध्यापकों की चिंता से बाहर रहता है । जो रचनाकार पाठ्यक्रम में अपनी रचनाएँ लगाये जाने के लिए व्याकुल रहते हैं, उन्हें भी अध्ययन–अध्यापन की समस्याओं से विशेष लेने–देना नहीं रहता, जैसे अधिकांश अध्यापक समकालीन साहित्यिक विकास से उदासीन रहते हैं । नित्यानंद तिवारी ने दोनों पक्षों को मिलाकर अपने अध्यापक और आलोचक के लिए एक कठिन, चुनौतीपूर्ण राह अपनाई । सामाजिक–ऐतिहासिक परिवर्तनों के साथ रचनात्मक लेखन में नए संस्कार आते हैं, साहित्यिक रूचि का विकास होता है लेकिन पाठ्यक्रमों में और कक्षाओं में उस रूचि–संस्कार का प्रवेश लम्बे समय तक नहीं हो पाता । परिणामस्वरूप पाठ्यक्रम और कक्षाओं में रूढ़िवाद के गढ़ बने रहते हैं और शिक्षा के माध्यम से समाज में आनेवाली पीढ़ी अपने मानसिक संस्कार में पिछड़ी रहती है ।
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