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Urdu Ka Rahasya

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औरंगजेब जैसे कट्टर मुगल मुसलिम शासक ने तो ब्रजभाषा को इतना महत्व दिया कि उसके एक व्याकरण, पिंगल और कोश का संपादन भी उसकी छत्रछाया में हो गया । उसकी इस भाषा–निष्ठा पर रीझकर अल्लामा शिबली नुमानी ने तो यहाँ तक खोज निकाला कि : ‘‘ब्रजभाषा की जिस क़दर इसके ज़माने में तरक्की हुई, मुसलमानों ने जिस क”दर इसके ज़माने में हिंदी किताबों के तरजुमे किए, और ख़ुद जिस क़दर ब्रजभाषा में नज़्म व नस्र लिखी, किसी ज“माने में इस क़दर हिंदी की तरफ़ इल्तफ़ात नहीं ज़ाहिर किया गया था ।’’1 यही क्यों, अभी उस दिन मुहम्मदशाह रँगीले के दरबार में ब्रजभाषा को सराहा गया और खान आरजू (मृ. 1169 हि.) ने ब्रजभाषा ही को शिष्ट भाषा माना था ।

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