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Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Lalitpur
ललितपुर बुंदेलखंड का एक महत्त्वपूर्ण जनपद है, जिसका इतिहास अपने भीतर बहुत सी विस्मयकारी कथाओं को समेटे हुए है । ललितपुर में उधार तो अब भी मिलता है, तब भी मिलता था जब देश के रणबांकुरे सिर पर कफन बांध कर 1842 में मधुकर शाह के नेतृत्व में सुराज के लिए निकले हों अथवा रानी झांसी की एक पाती पर महाराजा मर्दन सिंह अपनी सेना उधार देने को तैयार हो गये हों । हाँ, सच यही है कि यहां की मिट्टी में स्वाभिमान और लोगों के मन में देश के लिए मर मिटने के भाव कूट–कूट कर भरे हैं । प्राचीन काल से ही वीरों की यह भूमि साहस, त्याग, बलिदान एवं स्वाभिमान की कीर्ति गाथा रचती रही है । महाभारत काल में चेदिवंश के कालखंड में महाराजा शिशुपाल के अधीन था । अस्तु, फिर लौट कर चलें उस वीरभूमि ललितपुर की माटी पर जिसकी बेटी सारंधा का पुत्र छत्रसाल महा प्रतापी राजा बन अपनी तलवार की दम पर खंड–खंड से अखंड बुंदेलखंड राज्य की स्थापना करता है । उधर मुगल बादशाह औरंगजेब अपने धार्मिक पूर्वाग्रहों की वजह से देश के बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को उनके मंदिर एवं उपासना स्थल को नुकसान पहुंचा कर आहत करने लगा था । उत्तर–पश्चिम में सिख गुरु गोविंद सिंह तथा जाट मध्य भारत में बुंदेला राजपूत और दक्षिण भारत में मराठों ने मुगल अत्याचार का प्रभावी प्रतिकार करने के लिए तलवार उठा ली थी । विभिन्न क्षेत्रों के इन रणबांकुरों ने न केवल मुगलों के अत्याचारों पर अंकुश लगाया बल्कि देश की क्षेत्रीय ताकत को संगठित कर उनके विरुद्ध संघर्ष की परंपरा को प्रोत्साहित किया । इतिहास के ऐसे विषम कालखंड में बुंदेलखंड की धरती ने महावीर छत्रसाल को जन्म दिया था ।
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