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Aalochana Ka Swadesh

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युवा समीक्षक–सम्पादक–आलोचक छबिल कुमार मेहेर हिन्दी साहित्य के पाठकों के लिए एक नया नाम ज़रूर है, परन्तु बिल्कुल अपरिचित भी नहीं । गाहे–बगाहे पत्र–पत्रिकाओं में हमें उनके आलोचनात्मक लेख देखने–पढ़ने को मिल ही जाते हैं । आलोचना और समीक्षा के इस अराजक माहौल में भी निरन्तर सृजनशील रहकर छबिल कुमार ने हम सबको चमत्कृत किया है । ‘आलोचना का स्वदेश’ उनकी दूसरी आलोचनात्मक कृति है । सन् 2009 में प्रकाशित उनकी पहली आलोचनात्मक कृति ‘समीक्षा का आयतन’ के अलावा अब तक उनकी ग्यारह सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित–प्रशंसित हो चुकी हैं । मूलत% ओड़िआभाषी छबिल कुमार जिस सहजता से हिन्दी साहित्याध्ययन में सक्रिय एवं संलिप्त हैं, वह अप्रतिम है । वैयक्तिक राग–द्वेष, खारिज़–स्वीकार, मान–अपमान की भावनाओं से दूर रहते हुए छबिल कुमार ने हमेशा सृजन की सार्थकता एवं उसकी प्रासंगिकता पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है । यही कारण है कि उनकी समीक्षा–आलोचना में सृजन एवं सर्जक का निहितार्थ स्वत% उभरकर सामने आ जाता है । इस दृष्टि से उनकी समीक्षा–आलोचना को ‘अर्थान्वेषी आलोचना’ कहा जा सकता है । ‘आलोचना का स्वदेश’ की सार्थकता भी इसी में निहित है । इस पुस्तक में दस विशिष्ट आलेख संकलित हैं, जिसमें एक सजग युवा–आलोचक की उपस्थिति को सहज ही महसूस किया जा सकता है । और जैसा कि शीर्षकों से स्पष्ट है, ये सभी आलेख हिन्दी साहित्य के उन चर्चित एवं प्रतिनिधि सर्जकों–आलोचकों पर केन्द्रित है जिनका वास्तविक मूल्यांकन करने से आलोचक–समीक्षक अक्सर कतराते रहे हैंय अपने–अपने पूर्वाग्रहों, गुटबंदी और विचारधारा के चलते । -रमेश दवे वरिष्ठ कवि, कथाकार एवं आलोचक

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