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Aalochana Ke Aaine Mein

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गीतविधा में भावुकता मुखर हुआ करती है । ‘नवगीत’ भी इसका अपवाद नहीं है । लेकिन नवगीतकारों में अमरनाथ श्रीवास्तव इस माने में विशिष्ट हैं कि उनकी काव्याभिव्यक्ति ‘संयम की साँकल’ में बँधी कलात्मक परिधि के दायरे में बनी रहती है । उमाशंकर तिवारी की रचनाओं में भाव–प्रवणता अधिक है जो उनकी कलात्मक परिधि को तोड़ती–मरोड़ती चलती हे । गुलाब सिंह के काव्य–संकलन ‘धूल भरे पाँव’ में यह कलात्मक साँकल लुप्त है । उनकी काव्य–प्रतिभा उनकी गाँव–गिरावी अड़ियल अल्हड़ता का संभार लिये उनके कलाबोध को दरकिनार करती अपनी पगडंडी रचती है । यहाँ बहुत कुछ अनगढ़ है लेकिन बहुत कुछ है जिससे ऊर्जा और मौलिकता यइनकी और ओरिजनैलिटीद्ध का एहसास होता रहता है । गुलाब सिंह में प्राणवान सहजता है, उमाशंकर जी में यदा–कदा असपफल कलाकार दिखता है, लेकिन अमरनाथ जी की रचनाएँ हमेशा एक सावधान, शालीन एवं नागर तराश वाले कलाकार का बोध कराती हैं । अत% भाव–पक्ष थोड़ा दबा–दबा और कला–पक्ष मुखर है । संकलन की अंतिम कविता ‘इलाहाबाद में जमुना’ सोची–समझी कविता का एक अच्छा नमूना है । आश्चर्य नहीं, अमरनाथ जी के इस संकलन में व्यथा है लेकिन बौखलाहट नहीं है । तल शान्त है और कविताएँ अभिव्यंजनात्मक अधिक हैं । संकलित कविताओं में जगह–जगह बिखरी हुई पारस पंक्तियाँ हैं । इस प्रकार ‘दोपहर में गुलमोहर’ और इसका पूर्ववर्ती ‘गेरू की तिलिया’ अमरनाथ जी को एक वजनदार नवगीतकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं और यह एहसास देते हैं कि कविता ने नवगीत को एक प्रौढ़ कलात्मक आयाम दिया है जिसके बिना कविता टिकाऊ नहीं हुआ करती ।

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