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Agyeya Aur Prakriti

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अज्ञेय अपने काव्य संसार में लोक, प्रकृति, समाज और व्यक्ति के अंत%संपर्क को साधने में पूर्णत% सफल हैं । मनुष्य यदि शब्द है तो प्रकृति उसका सत्य । सत्य की उपलब्धि के लिए मनुष्य कहाँ जा सकता है सिवाय प्रकृति के ? प्रकृति का प्रेम और करुणा उसे सरस और सार्थक बनाते हैं । कवि चाहे ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ को पुकारे या ‘असाध्य वीणा’ पर सुर स्पंदित हों मूलराग करुणा है, प्रेम है, कोमलता है । यह परंपरा की देन है । यह परंपरा का विस्तार है । अज्ञेय ने अपने प्रेम अपनी सौंदर्याभिरुचि, उदासी, अनूभुति यहाँ तक कि दार्शनिकता की अभिव्यक्ति के लिए भी प्रकृति को चुना है । अज्ञेय के यहाँ प्रकृति के संरक्षण की बात तब से है जब पर्यावरणविदों की फसल उगी भी नहीं थी । नंदा देवी Üाृंखला की कविताएँ इसका उत्तम उदाहरण हैं । प्रकृति संरक्षण के साथ नंदा के धवल सौंदर्य में वे जीवन खोजते हैं । अज्ञेय को पहाड़ और समुद्र एक जैसे प्रिय हैं । दोनों उन्हें एक साथ चाहिए । सागर उन्हें अत्यंत प्रिय है, पहाड़ की तरह प्रकृति के अन्य अंशों की तरह । वह उनके और प्रकृति के विलगाव को समाप्त करता है उन्हें अहं से मुक्ति दिलाता है ।

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