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Andher Nagari : Soch Aur Srajan
‘अंधेर नगरी’ एक लौकिक मिथक है, जिसके बहाने भारतेन्दु भविष्य की नब्ज पहचानते हुए अपने समय की धड़कन को नब्ज“ाइत कर रहे हैं । यह अंधेर नगरी है अंधे कानून की, सांस्कृतिक धरातल पर देश के पंगु होने की, आर्थिक दृष्टि से ‘सोने की चिड़िया’ विलुप्त होने की, राजनीतिक दृष्टि से अराजकता और आतंक की, सामाजिक दृष्टि से शोषण और विषमता के उभरने–उभारने की और विचार की संवाहिका भाषा के छिन जाने की । देश–दुर्दशा के इस घातक माहौल में भारतेन्दु की दृष्टि पे्रक्षकीय विचार और उसके मूल्य विवेक पर टिकी है । ‘अंधेर नगरी’ में जहाँ–जहाँ रचनात्मक चिंतन में लिपटे पात्रों के संवाद अथवा घटना–व्यापार चलते हैं, वहाँ–वहाँ वे तल्खिया परिहास के माध्यम से द्रष्टा को ऐसी मन%स्थिति में ले आते हैं कि वे भारतेन्दु की अंतर्दृष्टि में निहित द्वंद्वात्मक स्थितियों में अपने समय की घातक परिस्थितियों एवं परिणामों को सोचने के लिए विवश हो जाते हैं । यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं है क्योंकि सोचना ही किसी कार्य को संकल्प और संघर्ष के साथ करने की पहली सीढ़ी हुआ करती है । इतना ही नहीं, उनके नाटकों में यह द्वंद्वात्मक स्थिति द्रष्टा के बीच करने और न करने का संकल्प और विकल्प देकर ही इति नहीं पाती बल्कि एक अंतर्विरोध का बीजवपन भी वे कर जाते हैं । इस मायने में वे द्वंद्व की खाई को पाटते हुए व्यक्ति के भीतर संघर्ष का अलाव जलाने वाले नाटककार हैं । रामविलास शर्मा ने उनके नाटकों में इस आग को देखा और पहचाना था । वस्तुत% इस दिशा में भारतेन्दु अपने युग में, यहाँ तक कि अपने मंडल में अपवाद रूप से विशिष्ट साहित्यकार थे, जिन्होंने समाज और देश को द्वंद्वात्मक स्थितियों से उबारते हुए लिखकर भी और अभिनीत करके भी लोकमानस में, उन्हीं की भाषा में, उन्हीं के सोए हुए विचारों को जाग्रत करने का शंखनाद किया । उस शंखनाद की अनुगूँज एक शताब्दी से ऊपर बीत जाने पर भी हमें सुनाई दे रही है और प्रेरित कर रही है हमें अपने समय के सवालों से जूझने के लिए । -रमेश गौतम
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