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Baat Bolegi

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मनुष्य ने आग के साथ–साथ भाषा और संवाद के रास्ते भी खोजे । कोई समाज या समुदाय जब भी संकट में होता है, वह संवाद के नये आयामों की तलाश करता है । संवाद दरअसल संस्कृति और समाज के बीच एक पुल की तरह है, जहाँ द्विआयामी यात्रा की जा सकती है । कर्मेंदु शिशिर की बातचीत की यह पुस्तक बात बोलेगी उसी द्विआयामी यात्रा की एक विनम्र मगर ईमानदार कोशिश है । विगत ढाई दशकों के सामाजिक, सांकृतिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों को देखने समझने और उनपर बहस करने का एक प्रस्थान इस पुस्तक में नज़र आता है– इस संवाद की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आपको बंद गली के आखिरी मुहाने पर नहीं ले जाती, बल्कि यह आपको विचारों के चैराहे पर ले जाती है, जहाँ से बकौल मुक्तिबोध कई राहें फूट निकलती हैं । नवजागरण, भाषा, कविता, कहानी, सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक परिदृश्य, मीडिया, शिक्षा, राजनीतिक गतिरोध, जातिगत विद्वेष, साम्प्रदायिकता आदि पर यहाँ गंभीरता से विचार किया गया है । बात बोलेगी का केन्द्रीय पहलू हैµसमकालीनता । यहाँ इतिहास, अतीत और परम्परा वर्तमान के आसंग में अपना अर्थ रखते हैं । यहाँ हर उत्तर वर्तमान को ही संबोध्य है । कर्मेंदु शिशिर आलोचनात्मक विवेक को कभी नहीं छोड़ते । वे जिस विचार से अपना गहरा नाता जोड़ते हैं, उसके प्रति भी आलोचनात्मक रुख अपनाये रखते है । ऐसा करते हुए वे सहजता और तटस्थता को कभी नहीं छोड़ते । कहना न होगा कि वर्तमान परिदृश्य में यह एक दुर्लभ और लुप्तप्राय संयोग है । शिक्षा संस्कृति को मनुष्य की मूल चेतना से जोड़ते हुए कर्मेंदु शिशिर आत्मालोचना पर बल देते हैं । जहाँ अपने लोगों के प्रति एक जिम्मेदार विचारक–आलोचक की बात हम यहाँ पढ़ते हैं, वहीं लोकजीवन में गहरे तक यकीन रखने वाले सहृदय को भी हम पढ़ते हैं । इस पुस्तक को पढ़ना आईने में खुद को देखना भी है । समय की शिला पर एक बेचैन और जिम्मेदार लेखक–आलोचक द्वारा उकेरे गये ये शब्द, इतिहास के लिए नहीं हमारे रास्ते के पत्थरों पर चोट करने के लिए उकेरे गये हैं ।

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