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Cinema Samay
इस देश की कई महान विडम्बनाओं में एक यह भी है कि यहाँ संसार की सबसे ज्“यादा फ़िल्में बनती हैं जिन्हें दुनिया का सबसे बड़ा दर्शक–वर्ग देखता है लेकिन एक कला के रूप में सिनेमा की जितनी उपेक्षा और अवमानना यहाँ होती है उतनी इस्लामी विश्व को छोड़ कर, जिसकी वजहें अलग हैं, और कहीं नहीं होती । भारत में आजकल बच्चा–बच्चा सैलफोन के ज़रिये सिनेमा के नाम पर जेब में रख कर जाने क्या–क्या देखता होगा लेकिन एक बीमार नैतिकता और बौद्धिक पिछड़ेपन के शिकार करोड़ों दकियानूस धर्मध्वजी भारतीय अभी–भी सिनेमा देखने को लुच्चों–लफंगों का कुटेव समझते हैं । ऐसे शुतुरमुर्गों को समझाया ही नहीं जा सकता कि सिनेमा अब सिर्फ़ लोकप्रिय या सस्ता मनोरंजन ही नहीं, एक महान कला के रूप में स्वीकृत हो चुका है । बेशक़ वह समय काटने का भी एक मीडियम है लेकिन अब, सिर्फ़ सौ वर्षों में, वह जिन ऊँचाइयों को छू चुका है उसे समयातीत, कालजयी फ़न, हुनर या क्लासिक आर्ट तस्लीम किया गया है ।
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