• New product

Jab Mai Stri Hoon

Select Book Type

In stock

क्या है रंजना का आदर्श लोक ? बिना किसी यूटोपिया के तो कोई आन्दोलन परवान नहीं चढ़ता! यदि मन में स्वप्न–लोक नहीं होगा, यथार्थ की समीक्षा होगी भी कैसे ? तो ये कविताएँ इसका उत्तर देती हैं, ये साझा करती हैं एक छोटे–से शहर के सीमान्त पर, पारिवारिक सुरक्षा केे बाहर रहकर कोई छोटी–सी कच्ची–पक्की नौकरी करने वाली एक स्त्री के स्वप्न और वे ढेर–सारी दहशतें जो उसे रह–रहकर झेलनी होती हैं सिर्फ इस कारण कि उसका वजूद स्त्री–काया में कैद है, काया जो युग–युगान्तर से स्त्री के शोषण का प्राइम साइट रही है, स्त्री–सम्बन्धी अपराधोंे का तलधरµभ्रूणहत्या, इन्सेस्ट, बलात्कार ट्रेफिंकिंग, पोनोग्राफी से लेकर रोज–रोज की मार–पीट, गाली–गलौज, प्रेमहीन देह–दोहन, घरेलू बेगार, सती, पर्दा, दहेज–दहन, साफ–सुथरे और सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था तक! पण्यीकरण (कमॉडिफिकेशन), स्त्री के सम्पूर्ण वजूद को सिर्फ देह में घटा देने का सारा षड्यन्त्र रंजना की सभ्यता–समीक्षा का उत्स है! पर ‘काश’ कहकर हताश नहीं बैठती ये कविताएँ! इनकी जिजीविषा इन्हें बहनापे का तबोहाब देती हैंµ‘आरुषि’, ‘मधुमिता’, ‘बच्ची की फरियाद’, ‘कुंती’, ‘माधवी’, ‘चाची’, ‘युवा संन्यासिनी को देखकर’, ‘कल्पना के बहाने’ आदि कविताएँ इसका भास्वर प्रमाण हैं कि फ्रांसीसी क्रान्ति ने समता और स्वाधीनता की पूर्णाहुति जिस ‘भाईचारे’ में मानी थी, उस ‘भाईचारे’ में ‘बहनापा’ शामिल नहीं था, इस हद तक स्निग्ध स्त्री–दृष्टि शामिल नहीं थी । कुछ था जो और परिष्कृत होना था! यह परिष्कृति, यह महीनी स्त्री–आन्दोलन की देन है जो वर्ग, नस्ल, धर्म, वर्ण-हर कृत्रिम निर्मिति के पार जाती है ।

You might also like