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Muktibodh Ek Punarmulyankan

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समकालीन हिंदी कविता के क्षेत्र में गजानन माधव मुक्तिबोध एवं कालजयी कवि हैं । प्रयोगवादी काव्य की दीर्घा में उनकी एक विशिष्ट पहचान है । इस पुस्तक में प्रस्तुत आलोचनात्मक मूल्यांकन में उनकी महत्त्वपूर्ण कविताओं का न केवल वस्तुपरक ढंग से प्रत्यावलोकन ही किया गया है अपितु आलोचक/ समीक्षक श्रीनिवास श्रीकान्त ने उनके काव्य चिंतन की अर्थवत्ता को एक विशिष्ट पदस्थल पर रहकर उसे एक रचनात्मक नैयायिक की तरह देखा परखा है । चर्चित कवि की रचना प्रक्रिया में उसका और उसके आसपास का एक ऐसा मनोसामाजिक जगत है जिसकी भरपूर पड़ताल इस सराहनात्मक पर्यवेक्षण से हुई है । लेखक ने मुक्तिबोध काव्य की उन गुणवत्ताओं की ओर संकेत किया है जिन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है । चर्चित काव्य संसार के रचना के परिवेश और तत्कालीन जन–परिप्रेक्ष्य में जाए बगैर काव्य की प्रकृति तक पहुंचना मुमकिन नहीं । लेखक ने यह कार्य एक प्रयोजनधर्मी प्रतिबद्धता के साथ निभाने का अनुकरणीय प्रयास किया है । उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण जनरुचि की सामरिक कविताओं को ही अपने इस शोधात्मक अध्ययन के अंतर्गत लिया है ताकि इन रचनाओं को एक सुविस्तृत देशकालिक पठनीय परिदृश्य के रूप में पूरी तरह जाना–समझा जा सके । मुक्तिबोध नवोदित प्रयोगवादी कविता में अपने सहकवियों के साथ गमन करते हुए भी एक प्रगतिशील कवि रहे हैं, ऐसा कहने में कोई संकोच नहीं ।

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