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Namdhari Sampridye : Udbhav Aur Vikas
यह पुस्तक नामधारी संप्रदाय के आरम्भ से विस्तार तक की घटनाओं के क्रमबद्ध एवं शोधपरक तथ्यों पर आधारित है । इसमें सतगुरु बाबा बालक सिंह जी के समय से लेकर सतगुरु प्रताप सिंह जी तक की समयावधि के अंतर्गत नामधारी सम्प्रदाय के विकास एवं विस्तार का विवरण उपलब्ध है । इसमें नामधारियों के सामाजिक–धार्मिक संस्कार, मर्यादा और विश्वासों के अतिरिक्त भारत के स्वाधीनता संग्राम में नामधारियों द्वारा किये गए बलिदान एवं उनके राजनीतिक विचारों का विस्तार से विवरण उपलब्ध है । नामधारी संप्रदाय को सशक्त करने हेतु समय–समय पर बनाए गए प्रबंधकीय ढांचे और समयानुसार उनमें किए गए परिवर्तनों का उल्लेख भी किया गया है । यह पुस्तक तत्कालीन भारतीय समाज और विशेषकर पंजाब के सामाजिक सांस्कृतिक घटनाक्रम को समझने के लिए एक तथ्यपरक एवं सटीक स्रोत भी है । हिंदी भाषा में नाहर सिंह जी की पुस्तक ‘नामधारी इतिहास’ के पश्चात यह इस प्रकार की प्रथम पुस्तक है जिसमें उपलब्ध सामग्री का विविध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर, इसके ऐतिहासिक पक्षों और विकास के पड़ावों का विस्तार के साथ विश्लेषण किया गया है । आशा है कि यह पुस्तक विस्तृत हिंदी जगत में नामधारी संप्रदाय के मूल सिद्धांतों और उनकी स्वच्छ जीवन शैली को पहुँचाने का आधार सिद्ध होगी ।
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