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Natakkar Bhartendu :Naye Sandarbh - Naye Vimarsh

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भारतेन्दु पुनरुत्थानवादी भी थे और नवजागरणवादी भी । उनका पुनरुत्थान का नजरिया अतीतोन्मुख मध्ययुगीनता से आधुनिकता की ओर झुका नजर आता है । वे सनातन धर्म की अंध हिंदू–परंपराओं के खिलाफ थे । हालांकि सनातन धर्म के प्रति उनकी आस्था अडिग थी । वे देशीय परंपराओं में परिवर्तन और बदलाव के पक्षधर थे । उनका नवजागरण हिंदू नवजागरण था । सांस्कृतिक पुनरुत्थान और हिंदू नवजागरण – उनकी दोनों चिंतन पद्धतियों का उद्देश्य देशवासियों में सामाजिक–सांस्कृतिक और राजनीतिक पराधीनता के विरुद्ध एक स्वस्थ भारत भाव पैदा करना था । वे समस्त अंतर्विरोधों के बीच हिंदू राष्ट्र की अवधारणात्मक संस्कृति का बीज सामाजिक चेतना की मिट्टी में बोने की गहरी कूटनीतिक कोशिश कर रहे थे, जो कहने को सांप्रदायिक भी कही जा सकती थीय लेकिन थी नहीं । उन्होंने हिंदुत्व से हिंदुस्तानियत के पहचान की सर्वप्रथम आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रस्तावना की जिसके दूरगामी स्वर जयशंकर प्रसाद के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बुनियाद बनी । भारतेन्दु के नाटकों में हिंदुओं की सामाजिक–सांस्कृतिक परंपराओं के राष्ट्रीयता की पहचान बनने के चिन्ह हैं । आज़ादी के अड़सठ साल बीत जाने पर आज के राजनीतिक दौर में व्यापक एवं समावेशी राष्ट्र की संकल्पना आज भी पूर्ण नहीं हो सकी है, यद्यपि राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य के लिए सुधी समाज और विद्वतजन लगातार विभिन्न मंचों से प्रयासरत हैं ।

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