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Rashtriya Mukti Andolan Aur Prasad

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छायावाद जैसे चर्चित साहित्यिक आन्दोलन का व्यापक मूल्यांकन अभी तक नहीं हो पाया है और प्रसाद प्रगतिशील आलोचना की पृष्ठभूमि में रहे हैं । इस अभाव की क्षतिपूर्ति है राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन और प्रसाद । यह संकलन 20वीं सदी के एक खास सांस्कृतिक परिदृश्य को सामने लाने की कोशिश है । साथ ही हिन्दी के महत्त्वपूर्ण लेखकों ने प्रसाद के रचनात्मक संसार को नये सन्दर्भों में देखा है । राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में प्रसाद के काव्य, कथा साहित्य और नाटक के उनके मूल्यांकन जितने अंतरंग है, उतने ही वस्तुपरक । प्रसाद से लेखकों का यह नया बौद्धिक सरोकार यदि एक महान परम्परा को आलोकित करता है तो वैश्वीकरण की वर्तमान विडम्बनाओं को भी सामने लाता है । भारत में रोमेंटिसिज्म पश्चिम के रोमेंटिसिज्म से प्रभावित होते हुए भी कैसे भिन्न है, छायावाद को अल्प अवधि में कितना विस्तृत काम करना पड़ा, राष्ट्रीय जागरण से प्रसाद का कैसा सम्बन्ध है, उन्होंने जीवन के दुखों को विषय बनाकर भी कैसा उदात्त सौन्दर्यबोध अपनी कृतियों मंें व्यक्त किया, उनकी अनुभूति और कल्पना के बीच कैसे–कैसे सृजनात्मक खेल हैं और उनकी विश्व चेतना आज के वैश्वीकरण से कैसे भिन्न है, ऐसे बहुत सारे प्रश्नों से सामना है शंभुनाथ द्वारा सम्पादित राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन और प्रसाद में । कुछ दस्तावेजी लेखों के साथ कई कोणों से प्रसाद पर लिखे गये लेखों का यह संकलन प्रसाद की एक नयी छवि बनाता है । एक उपयोगी और पठनीय पुस्तक ।

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