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Sahitya Ke Naye Paripekshya

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साहित्यकार जिस परिवेश के मध्य गुज़रता है उन परिस्थितियों से वशीभूत होता है तथा विभिé विधाओं के माध्यम से उसकी रचना सक्रिय होती है। चाहे वह कविता, कहानी, नाटक या उपन्यास हो । साहित्य को प्रभावित करने में मात्र परिस्थितियाँ ही नहीं हमारे पुराऐतिहासों, किंवदन्तियों, रूढ़ियों वेद–उपनिषदों यहाँ तक कि अन्य देशी–विदेशी साहित्य एवं संस्कारों का भी बडा स्थान रहा है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार, ‘‘साहित्य के अन्तर्गत वह सारा वाङ्मय समाहित किया जा सकता है जिसमें अर्थबोध के अतिरिक्त भावोन्मेश अथवा चमत्कारपूरण अनुरंजन हो तथा जिसमें उस वाङ्मय की विचारात्मक समीक्षा या व्याख्या हो’’ । हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। जिसका मुझे नाज़ है । इसी गौरव के साथ मैं अपने विचार आप लोगों से साझा कर रही हूँ । हिन्दी भाषा का बीज, सही भारत में अंकुरित हुआ लेकिन उसकी जड़ें आज समस्त विश्व भर में फैल गयी हैं । हिन्दी का साहित्य भारतवर्ष का गर्व बढ़ रहा है । भारत की जो अपनी संस्कृति होती है–शायद वह भारत की ही अमूल्य धरोहर है–उसे विश्व भर में पहुँचाने में हिन्दी की सेवा स्तुत्यर्ह है । न केवल हिन्दी बल्कि भारतवर्ष में जितनी भी भाषाएँ होती हैं और इन पर विशिष्ट साहित्य रचनाएँ निकलती हैं उन सभी का अनुवाद भी हिन्दी के ज़रि, हो रहा है । इसलिए विश्व भर में भारतीय साहित्य को फैलाने के कार्य में हिन्दी सक्षम निकलती है । यहाँ पर बीसवीं सदी के अभ्युदय चिंतक और विश्व मानवता के उपासक रोम्याँ रोलाँ के विचार प्रासंगिक प्रतीत होते हैं । ‘‘अगर इस धरती पर कोई ,क ,ऐसी जगह है, जहाँ सभ्यता के आरंभिक दिनों से ही मनुष्यों के सारे सपने आश्रय और पनाह पाते रहे हैं तो वह जगह हिन्दुस्तान है’’ ।

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