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Sahitya Vinod

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तीन दशक पहले प्रकाशित इस पुस्तक की प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है क्योंकि अनेक मित्र और अध्येता इसकी प्रतियाँ उपलब्ध न होने के कारण यह आग्रह करते रहे हैं कि इसका पुनर्प्रकाशन किया जाये । हम रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत ऐसी कई पुस्तकें पुनर्प्रकाशित करने का प्रयत्न कर रहे हैं जो ध्यान या उपल से उतर गयीं पर जिन्हें वहाँ होना चाहिये । सौभाग्य से इस बीच अनौपचारिक गद्य में रुचि और उसकी माँग दोनों ही बढ़ी हैं । हमारी उम्मीद है कि यह पुस्तक एक बार फिर पढ़ी–गुनी जायेगी । -अशोक वाजपेयी

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