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Sochne Pe Pahra Hai

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सोचने पे पहरा है’ अख़लाक ’ ‘आहन’ की एक तवील नज़्म का उन्वान है और उनके पहले शेरी मज़्मूआ का भी । वो नज़्म मज़्मुए में शामिल है । अख़्ालाक’ ‘आहन’ की लोकप्रिय पहचान फारसी भाषा–साहित्य के युवा विद्वान की हैµवे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में फारसी के प्रोफेसर हैं । यह उनकी शख्सियत का एक पहलू है । अख़लाक ’ ‘आहन’ की शख्सियत का दूसरा पहलू, जिसे वे अब तक सात पर्दों में छिपाते आ रहे थे, इस मज़्मुए के साथ सरेआम है । यानी वे अमीर खुसरौ, हाफि’ज, बेदिल, शामलू, फ’रोग़ फर्रुख़ज़ाद की शाइरी के विशेषज्ञ ही नहीं, खुद भी एक अहम सुख़नवर हैं । अख़लाक’ ‘आहन’ प्रमुख रूप में नज़्म के शा’इर हैं, मगर उन्होंने समय–समय पर कुछ ग़ज़लें भी कहीं हैं । इन दोनों काव्य–रूपों में उनकी कारदानी यहाँ ग़ौर की जाएगी । मौजूदा दौर की वैचारिक सांस्कृतिक बेचैनियाँ उनके लबो–लहज़े में जिस तरह अभिव्यक्त हुई हैं, उससे तरक्की पसंद तहरीक के वो दिन याद आते हैं, जब फैज़, सरदार जाफ’री, वामिक’ की नज़्में और मजरूह की ग़ज़लें एक आहंग की तरह हमारी संवेदना में, हमारे खून में बजती थींµरवाँ थीं । वह आहंग और वो बजना आज ख़्वाबनुमा हो गया है, जबकि दरहक’ीक’त आज उसकी, पहले कभी से, ज़्यादा ज़रूरत है । अख़्ालाक’ ‘आहन’ के कलाम को उसी नुक्त–ए–नज़र से पढ़ा जाना चाहिए- पढ़ा जाएगा । -सुरेश सलिल

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