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Teen Lambi Kavitain
आधुनिक युग का एक नया काव्यरूप है ‘लम्बी कविता’, जो जटिल आधुनिकता के व्यापक और गहरे आशयों की सुचिन्तित अभिव्यक्ति को रेखांकित करता है । आधुनिक मानव के जटिल यथार्थ में उलझी तरल अनुभूति बराबर मौजूद रही है इन लम्बी कविताओं में । इस परम्परा में पहला प्रयास सन् 1926 में सुमित्रानन्दन पन्त ने किया था, ‘परिवर्तन’ नामक लम्बी कविता से । इसके उपरान्त प्रसाद की ‘प्रलय की छाया’ प्रकाशित हुई । तदुपरान्त निराला की ‘सरोज–स्मृति’, ‘राम की शक्ति–पूजा’, नरेश मेहता की ‘समय देवता’, धर्मवीर भारती की ‘प्रमथ्यु गाथा’, अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’, मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में, धूमिल की ‘पटकथा’ आदि कई श्रेष्ठ लम्बी कविताएँ प्रकाशित हुई। इन कविताओं में कहीं आख्यानात्मकता है, कहीं इतिवृत्तात्मकता है, तो कहीं नाटकीयता-कोई आत्मकथात्मक है, तो कोई प्रगीतात्मक, और कोई एकालापात्मक । ‘लम्बी कविता’ समय की सर्जनात्मक अनिवार्यता है । इसे न तो आन्दोलन के रूप में देखा–परखा जा सकता है, न ही किसी काल विशेष या वाद–प्रवृत्ति के साथ जोड़ कर इसका सम्यक् मूल्यांकन किया जा सकता है । सच तो यह है कि ये लम्बी कविताएँ अपने व्यापक व गहरे आशयों को ध्वनित करने वाले कथ्य व संरचना के माध्यम से जहाँ एक ओर संवेदना और विचार को, स्मृति और इतिहास को तानने की क्षमता रखती हैं, वहीं दूसरी ओर भावनात्मक धरातल पर व्यापक आधुनिक जीवन–संघर्ष और गहरे मानवीय संकट को भी रेखांकित करती हैं । बार–बार मूल्यांकन व पुनर्मूल्यांकन के ताप से गुजरने वाली कविता त्रयी-‘राम की शक्ति–पूजा’, ‘असाध्य वीणा’, ‘अँधेरे में’ की महत्ता स्वयंसिद्ध है । एक लम्बे समय से विद्वानों–पाठकों–विद्यार्थियों के बीच इनकी ख़ासी चर्चा रही है ।‘प्रस्तुत पुस्तक इसी चर्चा की अगली कड़ी है । —इसी पुस्तक से
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