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Tulsidas Ki Kavya-Shakti (Sandarbh : Ramcharitmanas)

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तुलसीदास हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं । उनकी लोकप्रियता का अनुमान एक इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि चैबीसों घण्टे–सातों दिन, हर पल, विश्व में कहीं न कहीं निरंतर पढ़ी जा रही काव्य–कृति होने का गौरव केवल ‘रामचरितमानस’ को प्राप्त है । निरक्षर पाठकों से लेकर सजग विद्वानों तक, तुलसीदास सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं । कोई तुलसीदास को भेदभाव–समर्थक और नारी–निंदक कहता है तो कोई समता और नारी–गौरव का प्रतिपादक । महत्वपूर्ण यह कि तुलसी पर बहस–मुबाहिसा लगातार होता रहा है । जाहिर है कि वे एक जरूरी कवि हैं । अकारण नहीं कि उनका काव्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर डॉ– विनय विश्वास तक, समय–समय पर अनेक आलोचकों को लिखने के लिए तत्पर करता रहा है । नई कविता, मुक्तिबोध और समकालीन कविता पर लिखने वाले विनय विश्वास का तुलसीदास और ‘रामचरितमानस’ पर लिखना इसका सूचक है कि तुलसी जितने जरूरी कवि हैं, उतने ही कभी पुराने न पड़ने वाले कवि भी हैं । कोरोनाकाल तक में उनकी प्रासंगिकता को इस किताब में देखा और दिखाया गया है । विनय विश्वास के पास आलोचना की सहज और धारदार भाषा है । उन्होंने ‘रामचरितमानस’ को आधार बनाकर तुलसी की काव्य–शक्ति का समर्थ विश्लेषण प्रस्तुत किया है । वाल्मीकि और स्वयंभू की काव्य–शक्ति की अनेक रूपों में चर्चा करते हुए तुलसीदास का वैशिष्ट्य उजागर किया है । इस पर ध्यान जाना चाहिए कि तुलसी के बारे में जो भ्रामक बातें प्रचलित हैं, विनय उनको भी नज़रअंदाज़ नहीं करते बल्कि ठोस तथ्यों के हवाले देते हुए बड़ी स्पष्टता के साथ उनका निराकरण करते हैं । उनकी आलोचना ऐसी है, जो अपने को पढ़ने के लिए आमंत्रित भी करती है, विवश भी । न आलोचना की नीरसता उनके लेखन में मिलती है, न उखाड़–पछाड़य न अनावश्यक दुरूहता मिलती है, न विद्वता का प्रदर्शन । यदि तुलसीदास का काव्य और ‘रामचरितमानस’ विशाल समुद्र है तो विनय विश्वास इस किताब में उस गोताखोर की तरह नज़र आते हैं जो इसमें गहरे उतरा है और बहुत सारे बेशकीमती मोती निकालकर लाया है । –प्रो– अनिल राय हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

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