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Tut Chuki Hain Kadiyan

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‘टूट चुकी हैं कड़ियाँ’ मेरी तीसरी कविता संग्रह है । इस संग्रह की लगभग सभी कविताएँ समाज के प्रत्येक पक्षों को छूती हुई सामाजिक यथार्थ के प्रत्येक पक्ष को छूती हुई सामाजिक यथार्थ से रूबरू कराती है । जब समाज में संवेदना का स्थान मृत हो जाता है तो साहित्य ही उन भावनाओं को झकझोरने का सार्थक प्रयास करता है । - डॉ– नीतू ‘वत्स’

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