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Aatmkatha Aur Stri
एक विधा के तौर पर हिन्दी आत्मकथा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। उस समाज में जहाँ ‘आत्म’ के बखान को ही आत्ममुग्धता समझा जाता हो, वहाँ ‘आत्मकथा’ लेखन असाधारण साहस की माँग करता है। यह एक बड़ा कारण है, जिसके चलते तमाम आदिकालीन और मध्यकालीन रचनाकारों ने खुद को अभिव्यक्त करने के लिए ‘कविता’ को चुना, जहाँ उनका वैयक्तिक सार्वजनिक रूप धारण कर लेता है। आदिकालीन और मध्यकालीन रचनाकारों के जीवनवृत्त सम्बन्धी संकटों का एक बड़ा कारण यह भी है। ऐसे में जीवनवृत्त सम्बन्धी मनमानियाँ सामान्य बात हो जाती है और इस मनमानी की सर्वाधिक शिकार हाशिए की अस्मिताएँ ही हुई। कबीर और मीरा इसके सबसे बड़े उदाहरण है। विधाओं के मामले बड़े दिलचस्प है। ‘कथा’ का ‘आत्म’, ‘आत्म’ होकर भी ‘आत्म’ हो नहीं पाता। ‘एकपक्ष’ होकर भी ‘बहुपक्ष’ होना उसकी नियती है। ‘आत्मकथा’ का ‘आत्म’ ‘एकपक्ष’ ही रहता है, लेकिन उसके ‘एकपक्ष’ की ‘बहुपक्ष’ में तब्दीली की सम्भावनाएँ हमेशा बनी रहती है। यह सम्भावना पाठक से उसके एकात्म में निहित होती है, बावजूद इसके ‘तब्दीली’ की यह सरलीकृत सम्भावना शुरुआती स्त्री आत्मकथ्यों को ‘आत्मकथात्मक उपन्यासों’ में तब्दील कर देती है (स्फुरना देवी के ‘अबलाओं का इंसाफ’ (1927) और दिनेशनंदिनी डालमिया के ‘मुझे माफ करना’ (1974) आत्मकथ्य इसे अच्छे उदाहरण हैं)। यहीं से तमाम गड़बड़ें शुरु होती है और सारी विमर्शिकी आत्मानुभूति बनाम सहानुभुति की और भोगे हुए यथार्थ की प्रामाणिकता की छद्म बहसों में सिमटकर रह जाती है। ऐसे में अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता की बात तो बेमानी होती ही है, प्रासंगिकता के तमाम निकष भी भोथरे हो जाते है। अच्छी बात यह है कि ऐसा शुरुआती आत्मकथाओं के साथ ही है।
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