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Aksharo Ke Bich Giri Aurat

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कविता का इतिहास गाँवों एवं कस्बों में परिलसित उस जीवन का ऐतिहासिक प्रारूप है, जिसमें इस महान देश की भावात्मक दृष्टि एवं वैचारिक गतिशीलता पनपी हैं, विकसित होती दिखायमान है । इसलिए कविता में ही नहीं, जीवन को प्रतिबिम्बित करने वाली किसी भी विधा में स्त्रीपक्षीयता समय की माँग थी । स्त्रीकेन्द्रीयता पहलेपहल पुरुषकेन्द्रीयता की प्रतिपक्षी नजर आयी, मगर धीरे–धीरे वह नये सिरे से संसार को देखने की दृष्टि एवं उसके तहत कार्यान्वयन की ओर उन्मुख हुई । मानव अधिकार को ‘मानवी’ के अधिकार बनाने की माँग या मानवी के अधिकार का संरक्षण या स्त्रीपक्षीयता, स्त्रियों की ही नहीं बल्कि सांसारिक मुक्ति की स्वीकृति है । स्त्रियों की समस्या मूलत% समाज की समस्या है, नागरिक–अधिकारों को हासिल करने की समस्या है । दुनिया के अधिकतम सामाजिक जीव होने के बावजूद अधिकारविहिना–सत्ताविहिना रहने के कारण वे अधिकाधिक सन्दर्भों में उपेक्षित ही रही हैं । यथार्थ के आविष्कार की उत्कट वांछा में स्त्री, दलित, आदिवासी और पर्यावरण जैसे हाशिए के विषय केन्द्र में आए और ‘काव्येर उपेक्षिता’ की प्रेरणा से प्रतिफलित इतिवृत्तात्मत रुदन एवं ‘केवल श्रद्धा होने’ के आदर्शात्मक वाक्जाल से बढ़कर ‘विधवा’ एवं ‘तोड़ती पत्थर’ के चित्र अधिक सकारात्मक सिद्ध हुए ।

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