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Darshan Ke Vividh Aayam
दर्शनशास्त्र को सभी विषयों का सिरमौर माना गया है । इसके बिना न तो कला के सिद्धांत विकसित हो सकते हैं और न ही विज्ञान अपनी उपलब्धियों को गिना सकता है । मनुष्य की सोच को विकसित करने का आधार ही दर्शन है । इस सोच से ही सभ्यता और संस्कृति का विकास संभव हुआ और फलत% आध्यात्मिकता भारतीय दर्शन का प्राण बन गया तो आचरण की शुद्धि जनमानस के नस–नस में समा गयी । भारतीय दर्शन अत्यंत व्यापक, संश्लिष्ट और समग्रता का प्रतिपादक है । वह सभी प्राणियों को ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के रूप में देखकर समस्त जगत् को सर्वसामान्य एकता में बांधता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की कल्पना को साकार करता है । वैदिक युग के बाद अनेकों दार्शनिकों ने जो अपने सिद्धांत प्रतिपादित किये, वही बाद में चलकर धर्म में परिवर्तित हो गये । जैन और बौद्ध दर्शन इसी श्रेणी में आते हैं । जैन मत के ‘दर्शन और ज्ञान’ साधना में तप और आचार में सामयिकी का विश्लेषण किया गया है । वर्तमान युग में बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता और भारत के संदर्भ में बौद्ध दर्शन के व्यावहारिक पक्ष को भी दर्शाया गया है । मध्यकालीन निर्गुण संत कबीर के विचारों में सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए जातिवाद के विरूद्ध विरोध मुखरित हुआ है वहीं भक्ति का विश्लेषणात्मक विवेचन भी किया गया है । विज्ञान तथा आध्यात्मिकता के समन्वय की आवश्यकता आज पूर्व तथा पश्चित के विचारक भी महसूस कर रहे हैं क्योंकि इसी के द्वारा विश्व शांति, विश्व बंधुत्व का सपना साकार हो सकता है और आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है । डॉ– कंचन गुप्ता
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