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Hindi Navjagran Aur Stri Asmita

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स्त्री लेखन के इतिहास की पड़ताल में नवजागरण कालीन हिन्दी की पत्रिकाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हैै । सरस्वती, मर्यादा, प्रभा और चांद, नवजागरण काल की नामचीन पत्रिकाएं हैं । इन पत्रिकाओं को स्त्री अस्मिता की दृष्टि से खंगालना, स्त्री रचनात्मकता को कविता और कहानी से अलग उनके विचार और चिन्तन के माध्यम से रेखांकित करना, निश्चय ही बेहद जोखिम भरा काम है । तब तो और भी ज्यादा जब इतिहास और आलोचना में पुरुषांे का वर्चस्व हो और वे आंसू, आह और दर्द का ब्यौरा मानकर ‘नीर भरी बदली’ की तरह स्त्री–रचनात्मकता को मिटा देने को तैयार बैठे हों । इसमें कोई संदेह नहीं ये जोखिम भरा काम ‘सुनन्दा पाराशर’ ने उठाया है । बींसवी सदी के आरम्भिक चार दशकों की पत्रिकाओं की खोज बेहद श्रम साध्य काम है । जर्जर–पीले पन्नों में लगभग खोने को तैयार इस साहित्य का संरक्षण अब भी चुनौती है । हिन्दी नवजागरण और स्त्री अस्मिता के माध्यम से ‘सुनन्दा’ स्त्री रचनात्मकता की खोज करती हैंय मूल्यांकन करती हैं और उन स्त्री रचनाकारों से आपका परिचय कराती हैं जो इतिहास और आलोचना के पन्नांे में कहीं दर्ज ही नहीं है । वे बड़े से बडे़ रचना धर्मी, आलोचक और जन नेता के अंतर्विरोधो पर ध्यान आकृष्ट करते हुए स्त्री पुरुष की समानता के छद्म पर भी सवाल उठाती है । साहित्य राजनीति और स्त्रियों पर केन्द्रित अलग अलग प्रकृति की चार महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के माध्यम से स्त्री अस्मिता की खोज का यह प्रयास स्त्री लेखन के इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है । -प्रज्ञा पाठक

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