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Shahar Aayina Hai

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‘शहर आईना है’ में सुधीर विद्यार्थी और उनके लेखक की ज़मीन को बखूबी चीन्हा जा सकता है । डॉ– आरफा सय्यदा के शब्दोंं में कहा जाए तो कभी–कभी अपना चेहरा भी देख लेना चाहिए गोकि हमसे हमारे चेहरे हमेशा झूठ बोलते हैं । हमने अभी तक खुदफरेबी से अपने आपको अलग नहीं किया । खुदफरेबी में लुत्फ यह है कि वह नज़र आता है जो नहीं होता और जो होता है वह नज़र नहीं आता । सिर्फ किताब वह आईना है जो दिखा देती है कि जो था, जो है और जो होगा और जो हो सकता है वह सब नज़र आता है । सुधीर विद्यार्थी ने विगत 17–18 वर्षों के दरम्यान बरेली शहर के इतिहास, परम्परा और यहां के साहित्य–संस्कृति के साथ उस समय से भी गुुफ्तगू की है जिसमें जीते रहते हुए उन्होंने अपनी कलम से ‘बरेली : एक कोलाज’ रचा और थोड़े अधूरे और ज्यादा अपनेपन के साथ समय–समय पर उनकी इस डायरी में भी दर्ज होता चला गया । इस बेतरतीब इबारत में बरेली शहर की अनेक चमकीली और खुरदरी छवियां हैं जिन्हें मिलाकर किसी भी जगह का एक मुकम्मल खाका बनता है । इतिहास हमेंं पे्ररित ही नहीं, सचेत भी करता है । वह हाथ में थमी जलती टार्च की मानिंद है जो अंधेरे में रास्ता दिखाती है । ऊबड़खाबड़पन इसकी सिफत है । वे राहें कभी सीधी–सपाट और सरल नहीं होतीं जिनसे होकर हमारी पुरानी पीढ़ियोंं ने इतिहास–निर्माण के लिए अपने कठिन रास्ते तय किए और जिन पर हमें आगे चल कर जाना है । ‘शहर आईना है’ में एक शहरनुमा बस्ती के बुनियादी अक्स है जिन्हें जोड़कर देखते हुए जिस एक बड़ी और खूबसूरत तस्वीर का ढांचा बनता है उसे हम बरेली के नाम से जानते हैं और जिसे कभी–कभी ‘बांस बरेली’ भी कहा जाता है । लोक ने इसे ही कभी ‘बरेली सो शहर नगीना’ कह कर इसके सिर पर सुर्ख कलंगी लगाई थी । --कविता भारत

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