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Trilochan Ki Diary

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डायरी में अनेक प्रसंग हैं जब उनकी पत्नी उन पर खीझती हैं, ‘क्षोभक बातें’ कहती हैं लेकिन वे अपना धैर्य नहीं खोते । गाँव पर छोटे भाई से अनबन होती है तो पूरे एक हफ्ते तक मौन धारण कर लेते हैं लेकिन उनका एक और मन है जो अपने आसपास के सौन्दर्य से ही नहीं, दु:ख से भी द्रवित होता है । पूर्वी बंगाल का एक युवक गुप्त घाट की गीली मिट्टी पर भूखा–प्यासा पड़ा–पड़ा मर जाता है, उसका मांस गीध–कौए खाते रहे–यह खबर उनको बेचैन कर देती है । (18–20 मई, 1952) पंडों ने तीर्थयात्रियों की जान ले ली थी, उनकी सात लाशें भेलूपुर थाने के आगे देखकर सारे दिन उनका सिर चक्कर खाता रहा । (20 मार्च, 1951) 16 अप्रैल, 1953 को अस्सी घाट पर गंगा में जिस लड़के की डूबने से मृत्यु हो गयी थी उसकी लाश उठाने को छात्रों की भीड़ में से कोई लड़का आगे नहीं बढ़ा । सहदेव नाई और बाढ़ू अहीर के साथ जब त्रिलोचन ने कन्धा दिया तब कोई छात्र भी आगे आया वर्ना पहले झिझक रहे थे । 21 अक्टूबर, 1953 को जब डॉ. बाहरी ने अपने बँगला के ट्यूटर को नागा का पैसा न दिया तो त्रिलोचन को मिस तारा गोरावाला याद आयीं और ‘‘मन एक अकथनीय घृणा से भर गया ।’’ निर्मल हँसी या शिष्ट हास्य त्रिलोचन को प्रिय है और यह उनके लिये सहज है( व्यंग्य के लिये उन्हें सचेत होना पड़ता है । आम तौर पर वह व्यंग्य या आरोप लगाने पर चुप लगा जाते हैं । कभी–कभी उनका ‘विट’ भी जोरदार होता है, जैसे–राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. गणेश प्रसाद उनियाल ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘‘भाई, तुम्हें बहुत लोग जानते हैं ।’’ त्रिलोचन ने छूटते ही जवाब दिया, ‘‘इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है ।’’ अंग्रेजी के प्रोफेसर प्रो. राम अवध द्विवेदी का त्रिलोचन जी बहुत आदर–सम्मान करते थे । हमेशा उनका चरण छूकर प्रणाम करते थे । एक दिन चरण स्पर्श करते ही उन्होंने कहा, ‘‘यह मध्यकालिक प्रवृत्ति है ।’’ त्रिलोचन ने कहा, ‘‘आस्था इतिहासज्ञ नहीं होती ।’’ (29 जनवरी, 1951) कन्हैया लाल सेठ चित्रकार ने अबीर लगाकर पाँव छुए, त्रिलोचन ने उन्हें बढ़कर उठाया तो वे बोले–अपना स्थान मुझे मालूम है । ठाकुर प्रसाद सिंह का भी उन्होंने इसी तरह अभिनन्दन किया । त्रिलोचन ने डायरी में लिखा : ‘‘श्रद्धा मनुष्यता का रथ है ।’’ (1 मार्च, 1953)

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